प्रसिद्ध संगीतकार रवीन्द्र जैन का निधन

मशहूर संगीत निर्देशक, गायक और गीतकार रवींद्र जैन का 9 अक्टूबर, 2015 को निधन हो गया। वह 71 साल के थे। मूत्र संक्रमण से पीड़ित होने के कारण उनके वृक्क में दिक्कत पैदा हो गयी थी। जिसके इलाज के लिए उन्हें नागपुर के वोकहार्ड अस्पताल से बांद्रा के लीलावती अस्पताल लाया गया था। वह लीलावती अस्पताल में आईसीयू में जीवन रक्षक प्रणाली पर थे।

हिंदी सिनेमा में फिल्म 'सौदागर' से पदार्पण करने वाले संगीतकार और गीतकार रवींद्र जैन ने 'राम तेरी गंगा मैली', 'दो जासूस' और 'हीना' जैसी फिल्मों में संगीत देने व मशहूर धारावाहिक 'रामायण' को अपनी आवाज और धुनों के जरिए घर-घर में लोकप्रिय बनाया।

1980 और 1990 के दशक में जैन ने कई पौराणिक फिल्मों और धारावाहिकों में संगीत दिया था। रवींद्र जैन दृष्टिबाधित थे, इसके बावजूद उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत रचे और सुरीले नगमे दिए। फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' के लिए रवींद्र जैन को फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार भी मिला है।

रवींद्र जैन का जन्म 1944 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। वे सात भाई-बहन थे। संगीत का मार्ग उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए चुना, उनके पिता ने उन्हें यह मार्ग इसलिए सुझाया, क्योंकि इसमें आंखों का कम उपयोग होता है। काम में प्रति बेहद उनकी बेहद रुचि थी। कम उम्र में ही वे पास के जैन मंदिर में भजन गाने लग गए थे। वर्ष 1972 में उन्होंने अपने फिल्मी कॅरियर की शुरुआत की। उनके परिवार में पत्नी दिव्या और पुत्र आयुष हैं।

रवींद्र जैन के लोकप्रिय गीत:
● गीत गाता चल, ओ साथी गुनगुनाता चल (गीत गाता चल-1975)
● जब दीप जले आना (चितचोर-1976)
● ले जाएंगे, ले जाएंगे,दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (चोर मचाए शोर-1973)
● ले तो आए हो हमें सपनों के गांव में (दुल्हन वही जो पिया मन भाए-1977)
● ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए (पति, पत्नी और वो-1978)
● एक राधा एक मीरा (राम तेरी गंगा मैली-1985)
● अंखियों के झरोखों से, मैंने जो देखा सांवरे (अंखियों के झरोखों से-1978)
● सजना है मुझे सजना के लिए (सौदागर-1973)
● हर हसीं चीज का मैं तलबगार हूं (सौदागर-1973)
● श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम (गीत गाता चल-1975)
● कौन दिशा में लेके (फिल्म नदियां के पार)
● सुन सायबा सुन, प्यार की धुन (राम तेरी गंगा मैली-1985)
● मुझे हक है (विवाह)
भजन: मथुरा में कृष्णा, गणपतीचे दर्शन घेवूया, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे।

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