नोबेल विजेता लेखक वीएस नायपॉल का 85वर्ष में निधन

भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक वीएस नायपॉल (V. S. Naipaul) का 12 अगस्त, 2018 को उनके लंदन स्थित घर में निधन हो गया। वह 85 वर्ष के थे। उनका पूरा नाम विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल था।


रचनात्मकता और उद्यम से भरे नायपॉल का जन्म त्रिनिदाद में 17 अगस्त 1932 को हुआ। बाद में वह इंग्लैंड में बसे और उन्होंने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। उनका पहला उपन्यास 'द मिस्टिक मैसर' साल 1951 में प्रकाशित हुआ था। 1990 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नाइट की उपाधि से नवाजा। उन्हें 1971 में बुकर पुरस्कार और साल 2001 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 50 साल अपनी लेखकीय पारी के दौरान उन्होंने 30 से ज्यादा किताबें लिखीं, इसमें फिक्शन और नॉन फिक्शन दोनों शामिल हैं।

उनका परिवार लेखकों से भरा परिवार है। उनके पिता श्रीप्रसाद नायपॉल, छोटे भाई शिव नायपॉल आदि लेखक रहे हैं। उनकी पत्नी नादिरा नायपॉल पत्रकार रह चुकी हैं। नायपॉल के पूर्वज भारत से बंधुआ मज़दूर के तौर पर कैरेबियाई देश त्रिनिदाद लाए गए थे।  साल 1950 में इंग्लैंड में पढ़ाई के लिए उन्हें एक सरकारी स्कॉलरशिप मिली। इसके बाद अंग्रेज़ी साहित्य में पढ़ाई के लिए उन्होंने परिवार छोड़ दिया और आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी चले आए।

ब्रिटिश लेखक पैट्रिक फ्रेंच ने उनकी बायोग्राफी 'द वर्ल्ड इज वॉट इट इज : द ऑथोराइज्ड बायोग्राफी ऑफ वी.एस.नायपॉल' लिखी है, जिसमें उन्होंने बड़ी बेबाकी से अपने जीवन की घटनाओं के बारे में बताया है।

नायपॉल उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ थे और यह उनके लेखन में भी इसकी झलक मिलती थी. उनके बयानों से कई बार विवाद भी पैदा हुए।


वह 1959 में नायपॉल समीक्षकों की नज़र में तब आए जब वह सोमरसेट मॉगम पुरस्कार से सम्मानित हुए. यह पुरस्कार उनके कहानी संग्रह ‘मिगुएल स्ट्रीट’ के लिए मिला। इसके बाद 1961 में उनका उपन्यास ‘अ हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास’ आया. इस उपन्यास में उन्होंने बताया है कि कैसे औपनिवेशिक समाज होने की वजह से एक व्यक्ति की ज़िंदगी सिमट कर रह जाती है। उन्होंने यह उपन्यास अपने पिता को समर्पित किया था।

उनकी कुछ और मशहूर कृतियों में अ फ्लैग आॅन द आइलैंड (1967), इन अ फ्री स्‍टेट (1971), अ वे इन द वर्ल्ड (1994), हाफ अ लाइफ (2001) और मैजिक सीड्स (2004) हैं।

ग्रेजुएशन के बाद नायपॉल को कुछ समय तक ग़रीबी और बेरोज़गारी में भी दिन गुज़ारने पड़े. उन दिनों वह अस्थमा से पीड़ित थे और आय के लिए पत्नी पर निर्भर रहते थे। फिर वह बीबीसी वर्ल्ड सर्विस से जुड़ गए. यहां वह रेडियो पर पश्चिम भारतीय साहित्य पर चर्चा करते थे. इसी दौरान वह लेखन की ओर आकर्षित हुए और 1957 में अपनी पहली किताब ‘द मिस्टिक मैसर’ लिखी।

1990 में उन्हें नाइटहुड की उपाधि मिली थी।

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