जस्टिस वीरेंद्र सिंह उप्र के लोकायुक्त नियुक्त | UP Lokayukta

उत्तर प्रदेश में अदालती आदेशों के बावजूद लोकायुक्त नियुक्त न होने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसंबर को अपने संबैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज वीरेंद्र सिंह को 'आॅन स्पॉट' लोकायुक्त नियुक्त कर दिया। ऐसा पहली बार हुआ है जब लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग किया है।

न्यायमूर्ति रंजन गागई और न्यायमूर्ति एनवी रमण की पीठ ने लोकायुक्त के लिए प्रस्तावित पांच नामों की सूची मांगी और बिना किसी देरी के खुद ही संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए इनमें से एक जज वीरेंद्र सिंह को लोकायुक्त नियुक्त कर दिया।

कैसी होती है नियुक्ति?
लोकायुक्त की नियुक्ति में मुख्यमंत्री, विधानसभा में विपक्ष के नेता, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और राज्यपाल की भूमिका होती है।

क्या है विवाद?
उत्तर प्रदेश सरकार ने जस्टिस एन. के. महरोत्रा को 16 मार्च, 2016 को लोकायुक्त नियुक्त किया। 15 मार्च, 2012 को उनका कार्यकाल खत्म हो गया। लेकिन वह पद पर बने रहे। फिर 22 मार्च, 2012 को उत्तर प्रदेश सरकार ने लोकायुक्त का कार्यकाल छह साल से बढ़ाकर आठ साल कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष 24 अप्रैल को आदेश दिया था कि छह महीने में लोकायुक्त और उपलोकायुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी हो जाए। इसके बाद भी बार बार अदालती आदेश के बावजूद लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हुई।

सेवानिवृत्त जज वीरेंद्र सिंह : एक परिचय
– इनका जन्म 4 जनवरी, 1949 को हुआ और प्रारंभिक शिक्षा सहारनपुर के गागलहेड़ी में हुई।
– ये मेरठ विश्वविद्वालय से 1972 के लॉ ग्रेजुएट हैं।
– इनकी 1977 में पीसीएस जे में नियुक्ति हुई और 1989 में हायर ज्यूडिशियल सर्विस के लिए प्रमोट हुए।
– 2005 में डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज के रूप में प्रमोट किए गए।
– 13 अप्रैल, 2009 को हाईकोर्ट में एडिशनल जज बने।
– 24 दिसंबर, 2010 को हाईकोर्ट के जज की शपथ ली और 3 जनवरी, 2011 तक इलाहाबाद हाईकोर्ट में रहे।
– 24 नवंबर, 2012 को इन्हें राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। जहां उनका कार्यकाल 3 जनवरी, 2016 तक है।

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